28 फरवरी 2010 को कुंठित मठाधीशों के ब्लॉग व अरस्तू-चाणक्य शैली में गूढ़ टिप्पणियाँ पढ़ने की कोशिश करते हुए, नई दुनिया होली विशेषांक में हिन्दी ब्लॉग की ढ़ेरों तारीफ़ें की गईं हैं
नमूना देखिए
ब्लॉग दुर्बुद्धि जमात का कूड़ा-कचरा है…
हरेक ने ब्लॉग की अपनी दुकान खोल रखी है…
ब्लॉग में कोई कितनी ही भद्दी-गंदी बकवास-सी गालियां उलच दे, कोई सरकार, कोई मालिक, कोई पुलिस या सेना तक कुछ नहीं बिगाड़ सकती…
ब्लॉग पर लिखने वाला नाली साफ करने वाली स्टाइल में बदबूदार सामग्री दुनिया-जहां में फैला दे, कोई बाल बांका नहीं कर सकता…
ब्लॉग प्रभुओं का एक शब्द, अमेरिकी, चीनी राष्ट्रपति या ब्रिटिश प्रधानमंत्री तक, नहीं कटवा सकता है…खासकर हिंदी ब्लॉग पर उनका बस ही नहीं चल सकता…
ऋषि-मुनियों की परंपरा में हिंदी के ब्लॉग बाबाओं को मुदित, क्रोधित, आनंदित होने का अधिकार सुरक्षित…
वे कुपित होकर ब्लॉग में बड़े से बड़ा शाप दे सकते हैं…
महाभारत के चरित्रों की तरह कोई भी झूठ फैला सकते हैं…
अपना ब्लॉग बना भद्दी गाली का जवाब भद्दी गाली से दे सकते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि उसे कोई पढ़े…
ब्लॉग की बकवास का जवाब बकवास से क्यों नहीं दे सकते हैं?
आकाश लोक के रास्ते आ रहे ब्लॉग पढ़कर अपनी आंखें खराब क्यों करते हैं
इस लेख में बताया गया है कि
संभव है, यहां उनकी सामग्री छपने के बाद वे अपने ब्लॉग से यह सामग्री गायब ही कर दें
पूरा लेख पढ़िए ऊपर दी गई कतरन पर क्लिक कर
या यहाँ क्लिक कर लें

कुछ लोगों को मतिभ्रम हो जाता है. गद्दी पाकर तो कोई भी अपने लिये विक्रमादित्य समझ सकता है. कई आईएएस से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति पैदल घूमते हैं, लेकिन जो गद्दी पा गया वही सिकन्दर.
पता नहीं कूड़ा-कबाड़ा पढ़ने को महान पत्रकार ब्लाग्स पर जाते क्यों हैं? वैसे सच्ची बात यह है कि अधिक अकलमंद अगर सामने आ जाये तो कम अकलमंद को तकलीफ होना स्वाभाविक है. इसलिये चलिये कोई बात नहीं. हाथी को चलने दीजिये. बुरा न माने होली हैं. वैसे कुछ लोगों का बस चले तो इंटरनेट का लाइसेंस अपने यहां से देना शुरू कर दें.
असलियत में तो श्री आलोक मेहता अपनी तथाकथित प्रिंट वाली मानसिकता का कूडा कचरा या शायद ब्लोग जगत की बढती लोकप्रियता से उपजी हताशा से झुंझला कर अपनी बकवास को शब्द दे गए ..और अभी तो सिर्फ़ पढ लिया है …आपने इसे यहां तक पहुंचा कर ठीक किया है ….इसका जवाब किसी टिप्पणी में नहीं बल्कि बाकायदा पोस्ट में ही देना पडेगा मगर अभी होली है इसलिए इनकी इस अच्छी प्रस्तुति से उकसावे में आकर सचमुच वो नहीं करना चाहते अभी जो ये कह रहे हैं ..बस होली के बाद …..
अजय कुमार झा
in dino bahut se ptrkar kismat kee khaa rahe hai. e hai to satta ke chatukaar, ant-shant laikhane vaale, isaliye loktantr ke sabase naye maadhyam ko ye pachaa nahi paa rahe hai. blog loktantra ka paanchavaa kendriy khabmbhaa hai. log parhe yaa n parhe, man ki baat kah kar aadami khud ko halkaa mahsoos karyta hai. is maadhyam ko kachara kahane vale ki bhddhi ko khangaale to pataa chalega ki sabase zyada kacharaa to vaheen hai, khair abhi to holi ki शुभकामनाएं……
होली का मतलब मिलन, रंग-अर्थ है प्यार.
मिले सभी आ कर तभी, सतरंगी संसार.
फागुन में सब जल गया, जितना भी था रार,
निर्मल मन को कर गया, ये अद्भुत त्यौहार..
फाग लिए अनुराग की, पिचकारी के साथ,
कर देता है प्यार की, अंतस में बरसात.
कुछ लोग यहां बङे लेखक हैं,कुछ बङे तकनीकि विशेषज्ञ हैं…..सैल्फ मैड.शायद ब्लोगिंग को इन्होने बपौती समझ लिया है,उन्हें समझ लेना चाहिये.कि भाई लोग आप लोगों से ही परेशान होकर कुछ नया करने की चाह मैं लोगों ने ब्लोगिंग जैसे माध्यम को चुना है.और कचरा क्या है ये बंधुओ आप लोगों को अधिकार किसने दिया,संभवतया भारत के संविधान मैं तो नहीं.तो ये सब बहस किस लिये.आप को जो पढना है ,पढें न पढना है न पढें पर कम से कम इतनी बात तो समझ लें कि यह माध्यम बेलाग,बेबाक अभिव्यक्ति का माध्यम है और कम से कम इसमे तो कोई झूमरी तलैया या कचरा करने की कोशिश न करें.
रोज पढते हैं ..हम आप को,
सुनते हैं आप लोगों की बकवास…
टी वी के चैनलों पर
,आप की अभिव्यक्तियों को
जिन्हें बङी ही अटपटी
अंजान सी
पर प्रभावी सी दिखने वाली भाषा मैं लिपटी झूठ,
अब समझ आने लगी है,
अपने खुद के बनाये बुध्दिजीवी के झूठे प्रभामंडल को देख देख
उकता चुके लोगों को अपने कृत्रिम विश्लेषणों से
मुक्त होने दें अब,
हो सकता हैं आप पत्रकार हैं,या के लेखक या तकनीक विशेषज्ञ,तो क्यों नहीं आप लोग ही अपनी कोई इज्जतदार ,स्वायंभू,sobber,जगह तलाशें,क्यों कि यहां सब पके हुए लोग हैं ……….एन डी टी वीयों,आज तकों,और सही मायने मै इन अभिव्यक्ति के ठेकेदारों से.सो बंधुओ आप लोग कोई दूसरी जगह तलाश लें और इन छोटे मोटे लोगों को बोलने दें,क्यों कि ये अब रुकने वाले नहीं है.और क्यों अपना भी कचरा कर रहें हैं.
आलोक जी के आभारी हैं कि उन्होंने वो ढूंढ लिया जो हम न ढूंढ पाये। हम तो जो पढ़ना चाहते हैं, वही ढूंढ लाते हैं। वैसे अच्छा पढ़ना चाहेंगे तो अच्छा मिल जाएगा और बुरा पढ़ना चाहेंगे तो बुरा भी मिलेगा। प्रिंट साहित्य में भी मस्त और सस्ता साहित्य उपलब्ध है।
ब्लॉग में अच्छा साहित्य है, इसकी पुष्टि नई में प्रकाशित ब्लॉग पोस्टों को पढ़कर लग सकती है। जनसत्ता में भी स्तरीय ब्लॉग पोस्टें प्रकाशित होती हैं और भी बहुत सारे पत्र पत्रिकाएं हैं जो ब्लॉग की स्तरीय मनोरंजक सामग्री को प्रकाशित कर रहे हैं।
प्रत्येक प्रौद्योगिकी के नफा नुकसान तो होते ही हैं तो ब्लॉग प्रौद्योगिकी के भी हो रहे हैं तो अचरज नहीं होना चाहिए। कहा भी गया है कि 'छाछ छाछ गहि रहे, थोथा देय उड़ाय' पर आलोक जी ने थोथा ही छपवाय दिया। न मालूम क्यों ?
खैर … ब्लॉगरों को उद्वेलित होने की जरूरत नहीं है। अभी तो न जाने ऐसी कैसी परीक्षाओं से गुजरना है। पर गुजर नहीं जाना है। इसलिए आक्रोश नहीं खाना है।
रंग पर्व है रंगकामनाएं सबको ब्लॉग जगत की।
नई को नई दुनिया पढ़ें। नई छप गया और दुनिया रह गई। प्रेस के प्रेत यहां पर कीबोर्ड के प्रेत बनकर हाजिर हो जाते हैं। आखिर … होली है न ? पर होली पर बोली मीठी ही होनी चाहिए। गोली भी मीठी होनी चाहिए। सब मीठा ही होना चाहिए, चाहे डायबिटीज ही क्यों न हो जाए ?
शायद ये लोग डर गये हैं कि हमे चैनलस पर कौन देखेगा लोग तो ब्लाग लिखने और पढने मे मस्त हो जायेंगे। क्या इन्हें चैनलों का कचरा दिखाई नही देता? शायद अपनी रोज़ रोज़ की किरकिरी पढ कर बेचैन हैं। धन्यवाद इस जानकारी के लिये। होली की हार्दिक शुभकामनायें
अरे भाई और भाभियों इतनी उत्तेजना ठीक नहीं
होली है भाई होली है
सूट वाले बोल रहे हैं, कंठलंगोट भी लगाया है
लगता है सीधे लंदन से आया है.
दूसरों के दे रहे कानूनी ज्ञान
कितना मानते हैं खुद ये मेहेरबान .
और किसी को तो धौंसिया नहीं सकते
तो मिल गई एक गरीब की लुगाई
होली की हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई !!
ये प्रिंट मीडिया और टेलीविजन के "ज्ञानीजन" अपने माध्यमों के "वन वे ट्रैफिक" में ड्राइविंग कर बड़े आत्ममुग्ध रहते हैं. अपने लेखों को किलो के भाव जाते देखना नहीं पड़ता और इनकी बकवास पर झुंझलाकर चैनल बदलते दर्शकों के चेहरे इनके सामने नहीं रहते. रहता है तो केवल यह स्वयंभू विशेषज्ञ और हर मिनट पर ब्रेक लेने को आतुर एंकर. दोनों मिलकर "जो पादे सो संत, जो सूंघे सो महात्मा" के अंदाज में माहौल को गंधाते रहते हैं और फिर स्वयंकल्पित मुग्ध दर्शकों को सांई बाबा की मुद्रा में आशीर्वाद देते नजर आते हैं. ब्लाग पर आकर जरा हूट होने का भी मजा लूटो तब पता चलेगा "टू वे ट्रैफिक" के रोमांच का.
ब्लागिस्तान की जय, लिक्खाडानन्द महाराज की जय……….. मठाधीश महोदय की ऐसी की तैसी……
होली की शुभकामनायें !!
बेचारा आलोक मेहता
)
लगता है आलोक जी ने भी होली हुड़दंग मचाया है। ब्लॉग को गरियाने का उनका उद्देश्य नहीं रहा होगा। बहरहाल उन्होंने जिन ब्लॉग की चर्चा की उसके बारे में मैंने नहीं सुना था। साथ ही उनके दिए गए यूआरएल से वे ब्लॉग खुल भी नहीं सके।
मजे की बात ये पता चली है कि इस तरह के कोई ब्लोग है ही नहीं यानि कि सब कल्पना है ..अब मन किया गरियाने का तो कोई क्या करे
अजय कुमार झा
मेरे ख्याल से इस लेख के लेखक महोदय दिमाग से थोडे क्या?…पूरे पैदल हैं…उनके अपने बस का कुछ लिखना रहा नहीं होगा और नई दुनिया वालों से पेशगी ले चुके होंगे तो सोचा होगा कि कुछ भी अंट-संट लिख के दे देता हूँ?…कौन पूछता है?…
जनाब!…हम पूछते हैं….कि आपको किसने ये अधिकार दे दिया कि आप अपनी मर्ज़ी से जो जी में आए…बकते चले जाएँ?…आप आखिर जानते ही क्या हैं ब्लॉग्गिंग के बारे में?… प्रिंट मीडिया के तलवे चाटने से सिफारशी टट्टू यदा-कदा कामयाब हो जाया करते हैं …मुझे लगता है कि आप भी इसी की ही एक मिसाल हो …
आपके इस लेख को लिखने का क्या औचित्य था?…शायद ये भी आपको पता नहीं होगा
अच्छा है अलोक महहानुभाव ने होली पर ये लिखा अन्य्ह्था तो ब्लॉगर उनकी ऐसी की तैसी कर देते
महेश भाई, लन्दन को बदनाम मत करिए !!
ये तो लिखने का मसाला दे गये आकाश मार्ग से…
ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.
आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.
-समीर लाल ’समीर’
holi ki hardik shubhkamnaaye.
आलोक मेहता का दिल जलता है तो जलने दे। हा हा प्रिंट मीडिया का हक्का बक्का होना कितना सुखद है पाबला साहब। है ना।
शुक्र है कि ब्लॉगवुड से राज्यसभा में जाने के लिए कोई ब्लॉगर किसी पार्टी विशेष के नेताओं की चरण-वंदना नहीं करता…
जय हिंद…
@ कविता जी
यहाँ लंदन का उल्लेख रूप सज्जा से है प्रतीकात्मक है
शहर का कोई संदर्भ नहीं है
No one kicks the dead dog!
ALOK JI KO MIRCHI LAGI TO MAIN KYA KROON!
अगर पाबला जी का यह ब्लॉग न होता तो नई दुनिया मे छपा यह लेख हम तक पहुँचता कैसे ? यही है ब्लॉग की विशेषता । और इसकी लोकप्रियता बढ रही है इसीलिये इसपर व्यंग्य भी लिखे जा रहे हैं । इसे सकारात्मक रूप से ग्रहण करें ..वैसे आलोक जी के ब्लॉग का नाम क्या है ?
ये प्रिंट मीडिया होली के पर्दे में ब्लॉगर्स से पंगा लेना चाहता है, हमने यह लेख कल ही पढ़ा था और अपना तो सिर भन्ना गया था, कि भांग का नशा आजकल कुछ अलग किस्म का हो गया है, जो न करवाये कम है।
@ कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee
@ ब्लॉगर खुशदीप सहगल
HA HA HA HA HA
हे प्रभू इसे माफ़ करना, ये नही जानता ये क्या लिख रहा है.
कटिंग में दिया गया इनका लेख पढने से ऐसा नहीं लगता कि जैसे सारी बाते इन महोदय ने अपने बारे में ही लिखी हो !:)
Pabla ji ,kya bole aapko kaha ki kaudi laye aap ,bade patrakar maane jaane wale patrakar Alok ji ki durgati honi hi thi isbaar HOLI par,agar aapne inhe blog par reproduce na kiya hota to kaun padhta nai duniya jo ab keval regional paper bun kar rah gaya hai.
Jo bhi ho ,sabhi se nivedan hai KRIPAYA chama kariye ALOK ji ko ,dil ki kah to lene dijiye.
Pata nahi kyon itne bade naam rakne wale diggaj itna chota dil rakte hai?
Print media par kam kooda nahi par poore likhit sahitya ko koi kooda kaise kah sakta hai?sochna hoga,hame nahi balki bade bhai ALOK ji ko.AMEEN
हवन कीर्तन रखवाना पडेगा. दुर्बुद्धि नाशक केप्शूल की दो खुराक सुबह शाम इनको खिलाई जाये. और कीमत सब लोग चंदा करके अदा करें.
रामराम.