लखनऊ से प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका, कथाक्रम के अप्रैल-जून 2010 अंक में हिन्दी ब्लॉगिंग को मस्तराम की पोर्न भाषा सहित द्वेष, प्रतिस्पर्धा, ईर्ष्या, कुंठा से ग्रस्त तथा नितांत असभ्य, सामाजिक रूप से अमान्य शब्दावली का प्रयोग करते बताते हुए, संपादक शैलेंद्र सागर ने एक संपादकीय लिखा
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कुछ गलत नहीं लिखा…
हर क्षेत्र में अच्छे बुरे लोग पाए जाते हैं ,लेकिन उस क्षेत्र को ही गलत कह देना समझदारी नहीं और लेखक ने इस बात का जिक्र अपने पहले ही कालम में कर भी दिया है / इतना तय है की आने वाले पाँच वर्षों में ब्लोगिंग एक सशक्त मिडिया के रूप में जरूर उभरेगा और जिसे इस देश की सरकार को भी मानना पड़ेगा /
एकदम पाखंडी प्रलाप है। ये डरे हुए लोग हैं।
गिरेजेश जी से पूर्ण सहमति है…
एकदम पाखंड और शुतुरमुर्गी मानसिकता। ये लोग जीवन और कागज को एक दूसरे से एकदम अलग समझते हैं। कलम हाथ में आते ही आभासी जिम्मेदारी के बोझ तले दब जाते हैं और सामान्य से इतर होने के प्रयास में और भी फ़्रस्टेटेड हो जाते हैं।
जैसा समाज व्यवहार करता है, वैसा ही ब्लाग पर दिखेगा…
जमीन खिसक रही है
कुछ नहीं कहते, सबको पता ही है.
मानव की यह प्रवृत्ति है कि जब भी उसके सामने कोई नया विचार, नयी खोज सामने आती है, तो वह उसके नकारात्मक प्रभावों की ज्यादा चर्चा करता है। यह सम्पादीय इसी मानसिकता के तहत लिखा गया है।
सही है।ये डरे हुए लोग हैं।