कथाक्रम में, हिन्दी ब्लॉगों पर मस्तराम की पोर्न भाषा का प्रयोग किए जाने की बात करता संपादकीय

8 Responses

  1. पं.डी.के.शर्मा"वत्स" says:

    कुछ गलत नहीं लिखा…

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  2. honesty project democracy says:

    हर क्षेत्र में अच्छे बुरे लोग पाए जाते हैं ,लेकिन उस क्षेत्र को ही गलत कह देना समझदारी नहीं और लेखक ने इस बात का जिक्र अपने पहले ही कालम में कर भी दिया है / इतना तय है की आने वाले पाँच वर्षों में ब्लोगिंग एक सशक्त मिडिया के रूप में जरूर उभरेगा और जिसे इस देश की सरकार को भी मानना पड़ेगा /

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  3. गिरिजेश राव says:

    एकदम पाखंडी प्रलाप है। ये डरे हुए लोग हैं।

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  4. Neeraj Rohilla says:

    गिरेजेश जी से पूर्ण सहमति है…

    एकदम पाखंड और शुतुरमुर्गी मानसिकता। ये लोग जीवन और कागज को एक दूसरे से एकदम अलग समझते हैं। कलम हाथ में आते ही आभासी जिम्मेदारी के बोझ तले दब जाते हैं और सामान्य से इतर होने के प्रयास में और भी फ़्रस्टेटेड हो जाते हैं।

    जैसा समाज व्यवहार करता है, वैसा ही ब्लाग पर दिखेगा…

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  5. डॉ महेश सिन्हा says:

    जमीन खिसक रही है

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  6. Udan Tashtari says:

    कुछ नहीं कहते, सबको पता ही है.

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  7. ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ says:

    मानव की यह प्रवृत्ति है कि जब भी उसके सामने कोई नया विचार, नयी खोज सामने आती है, तो वह उसके नकारात्मक प्रभावों की ज्यादा चर्चा करता है। यह सम्पादीय इसी मानसिकता के तहत लिखा गया है।

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  8. कूप कृष्ण says:

    सही है।ये डरे हुए लोग हैं।

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