असली फिक्सचर्स की पहचान: जनसत्ता में ‘हथेली में तिनका छूटने का अहसास’
22 मई 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ अंतर्गत हथेली में तिनका छूटने का अहसास फिक्सचर्स का
सिनेमा का पुरोधा: जनसत्ता में ‘बना रहे बनारस’
21 मई 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में बना रहे बनारस सिनेमा
माधुरी बहन की नाजायज गिरफ्तारी: जनसत्ता में ‘The World I See Every Day and What I think About it’
20 मई 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में The World I See Every Day and What I think About it दुर्गति
मजदूर दिवस कितना सार्थक: जनसत्ता में ‘कविता रावत’
15 मई 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में कविता रावत का आलेख
उस मोड़ से शुरू करें फिर ये ज़िन्दगी: जनसत्ता में ‘लम्हों के झरोखे से’
14 मई 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में लम्हों के झरोखे से उस मोड़ से
पुरुष होने का दंभ: जनसत्ता में ‘प्रेमरस’
8 मई 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में प्रेमरस का आलेख
तैयारी.और जन से जुड़ाव का जोश: जनसत्ता में ‘The World I See Every Day and What I think About it’
7 मई 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में The World I See Every Day and What I think About it शमशाद बेगम
सिर्फ और सिर्फ प्रेम: जनसत्ता में ‘कुछ अहसास’
26 अप्रैल 2013 को जनसत्ता के नियमित स्तंभ ‘समांतर’ में कुछ अहसास प्रेम का

